Wednesday, 24 July 2019

नमक का दारोगा

जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे। पटवारीगिरी का सर्वसम्मानित पद छोड-छोडकर लोग इस विभाग की बरकंदाजी करते थे। इसके दारोगा पद के लिए तो वकीलों का भी जी ललचाता था।

यह वह समय था जब ऍंगरेजी शिक्षा और ईसाई मत को लोग एक ही वस्तु समझते थे। फारसी का प्राबल्य था। प्रेम की कथाएँ और शृंगार रस के काव्य पढकर फारसीदाँ लोग सर्वोच्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे।

मुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लडाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्व की बातें समझते हुए रोजगार की खोज में निकले।

उनके पिता एक अनुभवी पुरुष थे। समझाने लगे, 'बेटा! घर की दुर्दशा देख रहे हो। ॠण के बोझ से दबे हुए हैं। लडकियाँ हैं, वे घास-फूस की तरह बढती चली जाती हैं। मैं कगारे पर का वृक्ष हो रहा हूँ, न मालूम कब गिर पडूँ! अब तुम्हीं घर के मालिक-मुख्तार हो।

'नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृध्दि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती हैं, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ।

'इस विषय में विवेक की बडी आवश्यकता है। मनुष्य को देखो, उसकी आवश्यकता को देखो और अवसर को देखो, उसके उपरांत जो उचित समझो, करो। गरजवाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ ही लाभ है। लेकिन बेगरज को दाँव पर पाना जरा कठिन है। इन बातों को निगाह में बाँध लो यह मेरी जन्म भर की कमाई है।

इस उपदेश के बाद पिताजी ने आशीर्वाद दिया। वंशीधर आज्ञाकारी पुत्र थे। ये बातें ध्यान से सुनीं और तब घर से चल खडे हुए। इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र, बुध्दि अपनी पथप्रदर्शक और आत्मावलम्बन ही अपना सहायक था। लेकिन अच्छे शकुन से चले थे, जाते ही जाते नमक विभाग के दारोगा पद पर प्रतिष्ठित हो गए। वेतन अच्छा और ऊपरी आय का तो ठिकाना ही न था। वृध्द मुंशीजी को सुख-संवाद मिला तो फूले न समाए। महाजन कुछ नरम पडे, कलवार की आशालता लहलहाई। पडोसियों के हृदय में शूल उठने लगे।

जाडे के दिन थे और रात का समय। नमक के सिपाही, चौकीदार नशे में मस्त थे। मुंशी वंशीधर को यहाँ आए अभी छह महीनों से अधिक न हुए थे, लेकिन इस थोडे समय में ही उन्होंने अपनी कार्यकुशलता और उत्तम आचार से अफसरों को मोहित कर लिया था। अफसर लोग उन पर बहुत विश्वास करने लगे।

नमक के दफ्तर से एक मील पूर्व की ओर जमुना बहती थी, उस पर नावों का एक पुल बना हुआ था। दारोगाजी किवाड बंद किए मीठी नींद सो रहे थे। अचानक ऑंख खुली तो नदी के प्रवाह की जगह गाडियों की गडगडाहट तथा मल्लाहों का कोलाहल सुनाई दिया। उठ बैठे।

इतनी रात गए गाडियाँ क्यों नदी के पार जाती हैं? अवश्य कुछ न कुछ गोलमाल है। तर्क ने भ्रम को पुष्ट किया। वरदी पहनी, तमंचा जेब में रखा और बात की बात में घोडा बढाए हुए पुल पर आ पहुँचे। गाडियों की एक लम्बी कतार पुल के पार जाती देखी। डाँटकर पूछा, 'किसकी गाडियाँ हैं।

थोडी देर तक सन्नाटा रहा। आदमियों में कुछ कानाफूसी हुई तब आगे वाले ने कहा-'पंडित अलोपीदीन की।

'कौन पंडित अलोपीदीन?

'दातागंज के।

मुंशी वंशीधर चौंके। पंडित अलोपीदीन इस इलाके के सबसे प्रतिष्ठित जमींदार थे। लाखों रुपए का लेन-देन करते थे, इधर छोटे से बडे कौन ऐसे थे जो उनके ॠणी न हों। व्यापार भी बडा लम्बा-चौडा था। बडे चलते-पुरजे आदमी थे। ऍंगरेज अफसर उनके इलाके में शिकार खेलने आते और उनके मेहमान होते। बारहों मास सदाव्रत चलता था।

मुंशी ने पूछा, 'गाडियाँ कहाँ जाएँगी? उत्तर मिला, 'कानपुर । लेकिन इस प्रश्न पर कि इनमें क्या है, सन्नाटा छा गया। दारोगा साहब का संदेह और भी बढा। कुछ देर तक उत्तर की बाट देखकर वह जोर से बोले, 'क्या तुम सब गूँगे हो गए हो? हम पूछते हैं इनमें क्या लदा है?

जब इस बार भी कोई उत्तर न मिला तो उन्होंने घोडे को एक गाडी से मिलाकर बोरे को टटोला। भ्रम दूर हो गया। यह नमक के डेले थे।

पंडित अलोपीदीन अपने सजीले रथ पर सवार, कुछ सोते, कुछ जागते चले आते थे। अचानक कई गाडीवानों ने घबराए हुए आकर जगाया और बोले-'महाराज! दारोगा ने गाडियाँ रोक दी हैं और घाट पर खडे आपको बुलाते हैं।



पंडित अलोपीदीन का लक्ष्मीजी पर अखंड विश्वास था। वह कहा करते थे कि संसार का तो कहना ही क्या, स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज्य है। उनका यह कहना यथार्थ ही था। न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं नचाती हैं। लेटे ही लेटे गर्व से बोले, चलो हम आते हैं। यह कहकर पंडितजी ने बडी निश्ंचितता से पान के बीडे लगाकर खाए। फिर लिहाफ ओढे हुए दारोगा के पास आकर बोले, 'बाबूजी आशीर्वाद! कहिए, हमसे ऐसा कौन सा अपराध हुआ कि गाडियाँ रोक दी गईं। हम ब्राह्मणों पर तो आपकी कृपा-दृष्टि रहनी चाहिए।

वंशीधर रुखाई से बोले, 'सरकारी हुक्म।

पं. अलोपीदीन ने हँसकर कहा, 'हम सरकारी हुक्म को नहीं जानते और न सरकार को। हमारे सरकार तो आप ही हैं। हमारा और आपका तो घर का मामला है, हम कभी आपसे बाहर हो सकते हैं? आपने व्यर्थ का कष्ट उठाया। यह हो नहीं सकता कि इधर से जाएँ और इस घाट के देवता को भेंट न चढावें। मैं तो आपकी सेवा में स्वयं ही आ रहा था। वंशीधर पर ऐश्वर्य की मोहिनी वंशी का कुछ प्रभाव न पडा। ईमानदारी की नई उमंग थी। कडककर बोले, 'हम उन नमकहरामों में नहीं है जो कौडियों पर अपना ईमान बेचते फिरते हैं। आप इस समय हिरासत में हैं। आपको कायदे के अनुसार चालान होगा। बस, मुझे अधिक बातों की फुर्सत नहीं है। जमादार बदलूसिंह! तुम इन्हें हिरासत में ले चलो, मैं हुक्म देता हूँ।

पं. अलोपीदीन स्तम्भित हो गए। गाडीवानों में हलचल मच गई। पंडितजी के जीवन में कदाचित यह पहला ही अवसर था कि पंडितजी को ऐसी कठोर बातें सुननी पडीं। बदलूसिंह आगे बढा, किन्तु रोब के मारे यह साहस न हुआ कि उनका हाथ पकड सके। पंडितजी ने धर्म को धन का ऐसा निरादर करते कभी न देखा था। विचार किया कि यह अभी उद्दंड लडका है। माया-मोह के जाल में अभी नहीं पडा। अल्हड है, झिझकता है। बहुत दीनभाव से बोले, 'बाबू साहब, ऐसा न कीजिए, हम मिट जाएँगे। इज्जत धूल में मिल जाएगी। हमारा अपमान करने से आपके हाथ क्या आएगा। हम किसी तरह आपसे बाहर थोडे ही हैं।

वंशीधर ने कठोर स्वर में कहा, 'हम ऐसी बातें नहीं सुनना चाहते।

अलोपीदीन ने जिस सहारे को चट्टान समझ रखा था, वह पैरों के नीचे खिसकता हुआ मालूम हुआ। स्वाभिमान और धन-ऐश्वर्य की कडी चोट लगी। किन्तु अभी तक धन की सांख्यिक शक्ति का पूरा भरोसा था। अपने मुख्तार से बोले, 'लालाजी, एक हजार के नोट बाबू साहब की भेंट करो, आप इस समय भूखे सिंह हो रहे हैं।

वंशीधर ने गरम होकर कहा, 'एक हजार नहीं, एक लाख भी मुझे सच्चे मार्ग से नहीं हटा सकते।

धर्म की इस बुध्दिहीन दृढता और देव-दुर्लभ त्याग पर मन बहुत झुँझलाया। अब दोनों शक्तियों में संग्राम होने लगा। धन ने उछल-उछलकर आक्रमण करने शुरू किए। एक से पाँच, पाँच से दस, दस से पंद्रह और पंद्रह से बीस हजार तक नौबत पहुँची, किन्तु धर्म अलौकिक वीरता के साथ बहुसंख्यक सेना के सम्मुख अकेला पर्वत की भाँति अटल, अविचलित खडा था।

अलोपीदीन निराश होकर बोले, 'अब इससे अधिक मेरा साहस नहीं। आगे आपको अधिकार है।

वंशीधर ने अपने जमादार को ललकारा। बदलूसिंह मन में दारोगाजी को गालियाँ देता हुआ पंडित अलोपीदीन की ओर बढा। पंडितजी घबडाकर दो-तीन कदम पीछे हट गए। अत्यंत दीनता से बोले, 'बाबू साहब, ईश्वर के लिए मुझ पर दया कीजिए, मैं पच्चीस हजार पर निपटारा करने का तैयार हूँ।

'असम्भव बात है।

'तीस हजार पर?

'किसी तरह भी सम्भव नहीं।

'क्या चालीस हजार पर भी नहीं।

'चालीस हजार नहीं, चालीस लाख पर भी असम्भव है।

'बदलूसिंह, इस आदमी को हिरासत में ले लो। अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता।

धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला। अलोपीदीन ने एक हृष्ट-पुष्ट मनुष्य को हथकडियाँ लिए हुए अपनी तरफ आते देखा। चारों ओर निराश और कातर दृष्टि से देखने लगे। इसके बाद मूर्छित होकर गिर पडे।

दुनिया सोती थी पर दुनिया की जीभ जागती थी। सवेरे देखिए तो बालक-वृध्द सबके मुहँ से यही बात सुनाई देती थी। जिसे देखिए वही पंडितजी के इस व्यवहार पर टीका-टिप्पणी कर रहा था, निंदा की बौछारें हो रही थीं, मानो संसार से अब पापी का पाप कट गया।

पानी को दूध के नाम से बेचने वाला ग्वाला, कल्पित रोजनामचे भरने वाले अधिकारी वर्ग, रेल में बिना टिकट सफर करने वाले बाबू लोग, जाली दस्तावेज बनाने वाले सेठ और साकार यह सब के सब देवताओं की भाँति गर्दनें चला रहे थे।

जब दूसरे दिन पंडित अलोपीदीन अभियुक्त होकर कांस्टेबलों के साथ, हाथों में हथकडियाँ, हृदय में ग्लानि और क्षोभ भरे, लज्जा से गर्दन झुकाए अदालत की तरफ चले तो सारे शहर में हलचल मच गई। मेलों में कदाचित ऑंखें इतनी व्यग्र न होती होंगी। भीड के मारे छत और दीवार में कोई भेद न रहा।

किंतु अदालत में पहुँचने की देर थी। पं. अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंह थे। अधिकारी वर्ग उनके भक्त, अमले उनके सेवक, वकील-मुख्तार उनके आज्ञा पालक और अरदली, चपरासी तथा चौकीदार तो उनके बिना मोल के गुलाम थे।

उन्हें देखते ही लोग चारों तरफ से दौडे। सभी लोग विस्मित हो रहे थे। इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने यह कर्म किया, बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए? ऐसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करने वाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह क्यों कानून के पंजे में आए? प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था।

बडी तत्परता से इस आक्रमण को रोकने के निमित्त वकीलों की एक सेना तैयार की गई। न्याय के मैदान में धर्म और धन में यध्द ठन गया। वंशीधर चुपचाप खडे थे। उनके पास सत्य के सिवा न कोई बल था, न स्पष्ट भाषण के अतिरिक्त कोई शस्त्र। गवाह थे, किंतु लोभ से डाँवाडोल।

यहाँ तक कि मुंशीजी को न्याय भी अपनी ओर कुछ खिंचा हुआ दीख पडता था। वह न्याय का दरबार था, परंतु उसके कर्मचारियों पर पक्षपात का नशा छाया हुआ था। किंतु पक्षपात और न्याय का क्या मेल? जहाँ पक्षपात हो, वहाँ न्याय की कल्पना नहीं की जा सकती। मुकदमा शीघ्र ही समाप्त हो गया।

डिप्टी मजिस्ट्रेट ने अपनी तजवीज में लिखा, पं. अलोपीदीन के विरुध्द दिए गए प्रमाण निर्मूल और भ्रमात्मक हैं। वह एक बडे भारी आदमी हैं। यह बात कल्पना के बाहर है कि उन्होंने थोडे लाभ के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो। यद्यपि नमक के दरोगा मुंशी वंशीधर का अधिक दोष नहीं है, लेकिन यह बडे खेद की बात है कि उसकी उद्दंडता और विचारहीनता के कारण एक भलेमानुस को कष्ट झेलना पडा। हम प्रसन्न हैं कि वह अपने काम में सजग और सचेत रहता है, किंतु नमक के मुकदमे की बढी हुई नमक से हलाली ने उसके विवेक और बुध्दि को भ्रष्ट कर दिया। भविष्य में उसे होशियार रहना चाहिए।

वकीलों ने यह फैसला सुना और उछल पडे। पं. अलोपीदीन मुस्कुराते हुए बाहर निकले। स्वजन बाँधवों ने रुपए की लूट की। उदारता का सागर उमड पडा। उसकी लहरों ने अदालत की नींव तक हिला दी।

जब वंशीधर बाहर निकले तो चारों ओर उनके ऊपर व्यंग्यबाणों की वर्षा होने लगी। चपरासियों ने झुक-झुककर सलाम किए। किंतु इस समय एक कटु वाक्य, एक-एक संकेत उनकी गर्वाग्नि को प्रज्ज्वलित कर रहा था।

कदाचित इस मुकदमे में सफल होकर वह इस तरह अकडते हुए न चलते। आज उन्हें संसार का एक खेदजनक विचित्र अनुभव हुआ। न्याय और विद्वत्ता, लंबी-चौडी उपाधियाँ, बडी-बडी दाढियाँ, ढीले चोगे एक भी सच्चे आदर का पात्र नहीं है।

वंशीधर ने धन से बैर मोल लिया था, उसका मूल्य चुकाना अनिवार्य था। कठिनता से एक सप्ताह बीता होगा कि मुअत्तली का परवाना आ पहुँचा। कार्य-परायणता का दंड मिला। बेचारे भग्न हृदय, शोक और खेद से व्यथित घर को चले। बूढे मुंशीजी तो पहले ही से कुडबुडा रहे थे कि चलते-चलते इस लडके को समझाया था, लेकिन इसने एक न सुनी। सब मनमानी करता है। हम तो कलवार और कसाई के तगादे सहें, बुढापे में भगत बनकर बैठें और वहाँ बस वही सूखी तनख्वाह! हमने भी तो नौकरी की है और कोई ओहदेदार नहीं थे। लेकिन काम किया, दिल खोलकर किया और आप ईमानदार बनने चले हैं। घर में चाहे ऍंधेरा हो, मस्जिद में अवश्य दिया जलाएँगे। खेद ऐसी समझ पर! पढना-लिखना सब अकारथ गया।

इसके थोडे ही दिनों बाद, जब मुंशी वंशीधर इस दुरावस्था में घर पहुँचे और बूढे पिताजी ने समाचार सुना तो सिर पीट लिया। बोले- 'जी चाहता है कि तुम्हारा और अपना सिर फोड लूँ। बहुत देर तक पछता-पछताकर हाथ मलते रहे। क्रोध में कुछ कठोर बातें भी कहीं और यदि वंशीधर वहाँ से टल न जाता तो अवश्य ही यह क्रोध विकट रूप धारण करता। वृध्द माता को भी दु:ख हुआ। जगन्नाथ और रामेश्वर यात्रा की कामनाएँ मिट्टी में मिल गईं। पत्नी ने कई दिनों तक सीधे मुँह बात तक नहीं की।

इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया। सांध्य का समय था। बूढे मुंशीजी बैठे-बैठे राम नाम की माला जप रहे थे। इसी समय उनके द्वार पर सजा हुआ रथ आकर रुका। हरे और गुलाबी परदे, पछहिए बैलों की जोडी, उनकी गर्दन में नीले धागे, सींग पीतल से जडे हुए। कई नौकर लाठियाँ कंधों पर रखे साथ थे।

मुंशीजी अगवानी को दौडे देखा तो पंडित अलोपीदीन हैं। झुककर दंडवत् की और लल्लो-चप्पो की बातें करने लगे- 'हमारा भाग्य उदय हुआ, जो आपके चरण इस द्वार पर आए। आप हमारे पूज्य देवता हैं, आपको कौन सा मुँह दिखावें, मुँह में तो कालिख लगी हुई है। किंतु क्या करें, लडका अभागा कपूत है, नहीं तो आपसे क्या मुँह छिपाना पडता? ईश्वर निस्संतान चाहे रक्खे पर ऐसी संतान न दे।

अलोपीदीन ने कहा- 'नहीं भाई साहब, ऐसा न कहिए।

मुंशीजी ने चकित होकर कहा- 'ऐसी संतान को और क्या कँ?

अलोपीदीन ने वात्सल्यपूर्ण स्वर में कहा- 'कुलतिलक और पुरुखों की कीर्ति उज्ज्वल करने वाले संसार में ऐसे कितने धर्मपरायण मनुष्य हैं जो धर्म पर अपना सब कुछ अर्पण कर सकें!

पं. अलोपीदीन ने वंशीधर से कहा- 'दरोगाजी, इसे खुशामद न समझिए, खुशामद करने के लिए मुझे इतना कष्ट उठाने की जरूरत न थी। उस रात को आपने अपने अधिकार-बल से अपनी हिरासत में लिया था, किंतु आज मैं स्वेच्छा से आपकी हिरासत में आया हूँ। मैंने हजारों रईस और अमीर देखे, हजारों उच्च पदाधिकारियों से काम पडा किंतु परास्त किया तो आपने। मैंने सबको अपना और अपने धन का गुलाम बनाकर छोड दिया। मुझे आज्ञा दीजिए कि आपसे कुछ विनय करूँ।

वंशीधर ने अलोपीदीन को आते देखा तो उठकर सत्कार किया, किंतु स्वाभिमान सहित। समझ गए कि यह महाशय मुझे लज्जित करने और जलाने आए हैं। क्षमा-प्रार्थना की चेष्टा नहीं की, वरन् उन्हें अपने पिता की यह ठकुरसुहाती की बात असह्य सी प्रतीत हुई। पर पंडितजी की बातें सुनी तो मन की मैल मिट गई।

पंडितजी की ओर उडती हुई दृष्टि से देखा। सद्भाव झलक रहा था। गर्व ने अब लज्जा के सामने सिर झुका दिया। शर्माते हुए बोले- 'यह आपकी उदारता है जो ऐसा कहते हैं। मुझसे जो कुछ अविनय हुई है, उसे क्षमा कीजिए। मैं धर्म की बेडी में जकडा हुआ था, नहीं तो वैसे मैं आपका दास हूँ। जो आज्ञा होगी वह मेरे सिर-माथे पर।

अलोपीदीन ने विनीत भाव से कहा- 'नदी तट पर आपने मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार की थी, किंतु आज स्वीकार करनी पडेगी।

वंशीधर बोले- 'मैं किस योग्य हूँ, किंतु जो कुछ सेवा मुझसे हो सकती है, उसमें त्रुटि न होगी।

अलोपीदीन ने एक स्टाम्प लगा हुआ पत्र निकाला और उसे वंशीधर के सामने रखकर बोले- 'इस पद को स्वीकार कीजिए और अपने हस्ताक्षर कर दीजिए। मैं ब्राह्मण हूँ, जब तक यह सवाल पूरा न कीजिएगा, द्वार से न हटूँगा।

मुंशी वंशीधर ने उस कागज को पढा तो कृतज्ञता से ऑंखों में ऑंसू भर आए। पं. अलोपीदीन ने उनको अपनी सारी जायदाद का स्थायी मैनेजर नियत किया था। छह हजार वाषक वेतन के अतिरिक्त रोजाना खर्च अलग, सवारी के लिए घोडा, रहने को बँगला, नौकर-चाकर मुफ्त। कम्पित स्वर में बोले- 'पंडितजी मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि आपकी उदारता की प्रशंसा कर सकूँ! किंतु ऐसे उच्च पद के योग्य नहीं हूँ।

अलोपीदीन हँसकर बोले- 'मुझे इस समय एक अयोग्य मनुष्य की ही जरूरत है।

वंशीधर ने गंभीर भाव से कहा- 'यों मैं आपका दास हूँ। आप जैसे कीर्तिवान, सज्जन पुरुष की सेवा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। किंतु मुझमें न विद्या है, न बुध्दि, न वह स्वभाव जो इन त्रुटियों की पूर्ति कर देता है। ऐसे महान कार्य के लिए एक बडे मर्मज्ञ अनुभवी मनुष्य की जरूरत है।

अलोपीदीन ने कलमदान से कलम निकाली और उसे वंशीधर के हाथ में देकर बोले- 'न मुझे विद्वत्ता की चाह है, न अनुभव की, न मर्मज्ञता की, न कार्यकुशलता की। इन गुणों के महत्व को खूब पा चुका हूँ। अब सौभाग्य और सुअवसर ने मुझे वह मोती दे दिया जिसके सामने योग्यता और विद्वत्ता की चमक फीकी पड जाती है। यह कलम लीजिए, अधिक सोच-विचार न कीजिए, दस्तखत कर दीजिए। परमात्मा से यही प्रार्थना है कि वह आपको सदैव वही नदी के किनारे वाला, बेमुरौवत, उद्दंड, कठोर परंतु धर्मनिष्ठ दारोगा बनाए रखे।

वंशीधर की ऑंखें डबडबा आईं। हृदय के संकुचित पात्र में इतना एहसान न समा सका। एक बार फिर पंडितजी की ओर भक्ति और श्रध्दा की दृष्टि से देखा और काँपते हुए हाथ से मैनेजरी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए।

अलोपीदीन ने प्रफुल्लित होकर उन्हें गले लगा लिया

साभार-
Premchand.co.in.

हुंकार री कलंगी


मेवाड़ में भीलवाड़ा से लगभग 64 की.मी. कोशीथल ठिकाणा है। यह ठिकाणा रावत चूंडा जी के वंशज जग्गावत चुण्डावत के वंशधरों है। निम्नलिखित ऐतिहासिक घटना महाराणा राज सिंह जी द्वितीया के शासन काल(1754-1761ई.)में घटित हुई। इस घटना को रानी लक्ष्मी कुमारी चुंडावत ने राजस्थानी भाषा में कुछ यूँ व्यक्त किया है………

मेवाड़ रा सारा सरदारा रे नाम हुकुम लिख्यो ग्यो। “सारा सरदार आपरी पूरी जमीत अर पूरा ससतंरा सूधी उदैपुर हुकूम पोछतां ही हाज़र व्ह जावें। देर नी करें” “हुकुम रे उपरे राणा जी आप दसगतां सूँ  दो ओळां लिखी”‘, “जो हाज़र नी वेला विरी ज़ागीर एकदम ज़ब्त कर ली जावेळा। कायँ तरे री रियायत कोणी होसी। देश री विपद री वेळा में हाज़र नी वेणो हराम ख़ोरी मानी जासी। “

सवारां ने हुकुम रा कागद दे दोड़ाय दीधा।

कोसिथळ रा कामदार रा हाथ में सवार जाय हुकुम पकडायो,रसीद पाई कराई।बाँच्यो,बाँचता ही कामदार रो मूंडो उतरग्यो।कोसीथळ चूण्डावता रीं छोटी-सी जागीर ही। वठा रा ठाकर दो तीन बरस पै’ला एक झगड़ा में काम आयग्या। दो बरस रा टाबर ने छोड़ग्या। ठिकाणा में नैनपण !(बचपन) राणाजी रो यो करड़ो हुकुम!!भगवान चोखी वणाई!!!टाबर ठाकर,री माँ ई बाळक माथै आसा रा दीवा जोवती आपरी जुण काट री।  कामदार जनानी डोढ़ी पै जाय अरज़ कराई,”माँजी साब ने अरज़ करो,जरुरी बात अरज़ करणि हैं।”

डावड़ी जाय कह्यो,”ठिकाणा रा कामदार फोजदार डोढ़ी पै ऊमा है। आप सुं मुंडामुंड बांत करबा ने हाज़र वेह्वा री के है। ”

मांझी री छाती धड़-धड़ करवा लागी,”फेर कोइ नवो दुःख तो नई आयग्यो। ”

डावड़ी ने कह्यो,”बारणा पे पड़दो बांध दे,वाँने मांयनै बुलाय ला।”

बेटा री आंगळी पकड़,पड़दा रे सारे मांयने ऊभी व्हेयग्या। कामदार फोजदार मुजरो कर पड़दा सूँ व्हेग्या। हाथ  लाम्बो कर रणजी रा हुकुम रो कागद पड़दा में मांजी ने झलायो।

“अबै?” “बाँचता ही मांजी रा मुंडा सूं दो अक्खर हीज निकळ्या।” “अबै आप हुकुम दो जो ही करां।ठाकरसा तो पूरा पांच बरस रा ही कोयनी व्हीया,चाकरी में लेर जावां तो किस तरे ले जावा।”मांजी री आंगळी पकड़ने ऊबा बेटा री काळी-काळी भोळी-भोळी आँख्या सूँ जाय टकराई माँ री ममता जागी गी।रूँ रूँ ऊभो व्हेग्यौ,छाती में दूध उतरवा रो सो सरणाटो आयग्यो। लारे रो लारे “जो हाज़र नी व्हेला वीरी जागीर ज़ब्त करली जासी।”हुकुम री औळा बळबळता खीरा री नांई आंख्या आगै चमकगी।

मन में एक साथे क़तरा ही विचार आयग्या। “जागीर जब्त हो जासी?म्हारो बेटो बाप दादा रा राज़ बाहिरो व्हे जावेलो। वीं री पांच में कांई इज़्ज़त रैवेला?वीं रे बाप नीं रिया पणम्हू तो हु। म्हारे जीवतां जींव बेटा रा रो हक छूटे,धिक्कार है म्हारे मिनख जमारा पै। म्हूं असि खोडीली हूँ कांई जो पीढ़ियाँ री भौम ने गमाय दूँ। म्हारा वंश पै दाग नीं लागें?”

वीरीं आंख्या रे आगे एक तसबीर सी आयगी जाणे वीरो जवान बेटो ऊभो है,सगा परसंगी(रिश्तेदार) रोळ में मोसो मार रियो है,”ये लड़ाई में नी पधारया सा जो कोशीथळ ने राणाजी खोस लीधी।हे हे हे!यां चुण्डावता ने आपरी वीरता रो घमंड है।”दूजे ही पल दांता री कट कट्या भींचता बेटा रो निचो माथो,नीची नज़र व्हेती लगी दिखी।

माँजी रा माथा में चक्कर आयग्यो। जवान व्हीया बेटो ई माँ ने जतरो धिक्कारे थोड़ो। वाने याद आयगी आपरे बाप रा मुंडा सूं सुणी जूनी काण्या, लुगाया कसी कसी वीरत सुं झगड़ा कीधा। आँरे ईज खानदान में पत्ताजी चूण्डावत री ठुकराणी अकबर री फोज सूँ लड़ी, गोळियाँ री रीठ बजाय दीधी। पछै म्हूं नीं जावू?

ई विचार सूँ वांरा हालता मन में थिरता आयगी। जीव नेत्र चमकग्या। जीव सोरो व्हेग्यो। घणां ठिमरास (धीरज)सूँ पड़दा री आड में सूँ बोल्या, ‘’धणियाँ रो हुकम माथा पै। करो, जमीत री त्यारी करो। घोड़ा आदमियां ने त्यार होण रो हुकम दो।’’

‘’वो तो ठीक है। पणी धणी बिना फोज कसी।‘’

‘’क्यूँ म्हूं हूँ के धणी। म्हू जावूँला।‘’

“आप।” अचम्भा सूँ कामदार अर फौजदार दोवां रा मुंडा सूँ एक साथ ही निकळ्यो।

“हाँ म्हूँ। अचम्भा री काँई बात है। थांरे इच घराना में कतरी ठुकराणियाँ लड़ाई में जूझी हे के नी?थाँ कस्या जाणो कोयनी?म्हूँ कोई अणूती वात कर री हूँ के,पत्ताजी री माँ अर वांरी ठुकराणी अकबर सूँ लड़ता लड़ता मरयां के नीं?महूँ ही वांरा हीज घरणा में आऊं हूँ। म्हूँ क्यों न जावूँ?”

जमीत सजगी?नागरा पे कूंच रो डंको पड्यो।निसाण री फर्रियाँ खोल दीधी।पाखर गल्यो  घोड़ो आय ऊभो व्हीयो।माथे टोप,जिरह बख्तर रा काळा लोह सूँ ढक्या हाथ बेटा री कंवळी-कंवळी बाहाँ ने पकड़ गोद में उठावा ने आगे व्हीया।टाबर सहमगयो।बोली तो माँ सरीखी अर यो अजब भेख रो आदमी कुण.गालां रे होंठ अड़ाता-अड़ाता माँ री पलकां आली व्हेगी,”बेटा,यो सब थारे वास्तै,थारी इज़्ज़त वास्तै।”एक ठंडी साँस रे साथे वारां होंठ हाल्या।आगे आगे घोड़ा पै भालो भळकावतो फ़ौज रो मांजी अर लारे लारे साड़ी जमीत उदैपुर आय हाज़री में नामो मंडायो,”कोशीथळ रा फलाणा सिंघ चूंडावत मय जमित रे हाज़र।”

हमलो व्हीयो।हड़ोल(हरावल-युद्ध की प्रथम पंक्ति) चुण्डावताँ री। हमलो करे तो पै’लां हड़ोल वाळा ही आगे बढ़े अर सत्रुवाँ से हमलो झेले तो ही हडोल पे ही जोर आवे। सिंधु राग गावण लाग्या। हड़ोल रा अध् बीचे,चूंडावतां रा पाटवी सलूम्बर रावजी ऊभा व्हे बोल्या,”मरदां!दुसमणां पै घोड़ा ऊर दो। मर जाणों पर पग पाछे नीं  देणो। या हड़ोल में रैवा री इज़्ज़त,आपां पिढ्याँ सूँ निभाय रिया हां,आज ई आपणी ज़िम्मेदारी ने पूरी निभावजो,देस सारूं मरणो अमर वेहणो है। हाँ,खेचों लगामाँ।

एक हाथ सू लगाम खेंचि दूजा हाथ में तरवारां तुलगी।

हडोल वालाँ रा घोड़ा उड़्या जारे भेलै मांजी घोड़ा ने उडायो। खचाखच सरु व्ही। तरवारां रा बटका व्हेण लाग्या अर माथाँ रा झटका।

मांजी री तरवार ही पळाका लेय री,एक जणा पे तरवार रो वार कीधो,वी फुर्ती सूँ वार ने ढ़ाल पै झेल पाछो मारयो जो पासळी ने पोवतो लगो बारे निकळ्यो।माँजी री रान छुटगी साथे रै साथै घोड़ा सूँ निचे ढ़लकग्या।

सांझ पड़ी। झगड़ो बंद हुयो। खेत सँभाळवा लाग्या। घायला ने उठाय-उठाय पाटा पीड़ करवा लाग्या। लोह री टोप सुं बारे कैसलटक रीया।पाटो बांधवा  ने हाथ लगायो तो देखे लुगाई। वठै रा वठै ठबक्या रेग्या।”या कुण अर क्यूँ।” राणाजी ने अरज़ व्ही,’घायला में  लुगाई पूरा वीर भेस में मिली।नाम पतो पूछाँ तो बतावै नी।’

राणाजी गिया।लोहा रो टोप निचे गज-गज लम्बा केश लटक रिया,लोयाँ सूँ भरया चिपक रिया।”साँच साँच बतावो नाम ठिकाणो।छिपावो मत दुसमण व्होला तो ही म्हूँ थारो आदर करूँ।म्हारे बेन ज्यूँ हो।”

“कोशीथळ ठाकर री माँ हूँ अन्दाता”माँजी बोल्या। ‘हे!राणाजी अचंभा सूँ कूदया।थां लड़ाई में क्यूँ आया?” “अन्दाता रो हुकुम हो। जो लड़ाई में हाजिर नी वें जीरी जागीर जब्त व्हे जावेला।मारे टाबर छोटो है। हाजर नी व्हेणो मालकाँ  री अर मेवाड़ री हरामखोरी वेह्ती।”करुणा अर गुमान रा आँसू राणाजी रे आँख्या में छलक गिया।”धन्न है थाँ!”राणाजी गदगद व्हेग्या।

“यों मेवाड़ बरसां सूँ  आन राख रियो जो जसी देवियाँ रो प्रताप है। थाँ देवियाँ म्हारो अर मेवाड़  रो माथो ऊंचो कर राख्यो है। जठा तक असि माँवा हे जतरे आपाँ रो देस पराधीन कोनी व्हे।”

ई वीरता रा एवज में,थाँने इज़्ज़त देणो चावूँ,बोलो थाँ ही बतावो,जो थाँरी इच्छा व्हे।मांजी सोच में पड़ग्या,कोई इच्छा व्हे तो माँगे।वाँरी आँख्या आगे बेटा री वे काळी काळीं भोळी भोळी आंख्या फिरगी।माँ री ममता झटको खाय जागगी।

“अनदाता राजी राजी हो अर मर्ज़ी हिज हे तो कोई असि चीज बकसावो जाँसो म्हारो बेटो पांचा में माथो करने बैठे।”

“हुँकार की कलंगी थाँने बगसी जो थाँरो बेटो ही नी पीढ़िया लगाय,कलंगी पै’र ऊंचो माथे कर थाँरी वीरता ने याद रखावैला ।
        #रानी_लक्ष्मीकुमारी_चुण्डावत

Monday, 27 May 2019

बच्चों के लिए आवश्यक हैं...जीवन कौशल

21 बच्चे हमेशा के लिए सो गए फिर भी
हम नहीं जागेंगे, हैं ना...

            "कुछ विषय ऐसे होते हैं जिनपर लिखना खुद की आत्मा पर कुफ्र तोड़ने जैसा है, सूरत की बिल्डिंग में आग...21 बच्चों की मौत...आग और घुटन से घबराए बच्चों को इससे भयावह वीडियो आज तक नहीं देखा....इससे ज्यादा छलनी मन और आत्मा आज तक नहीं हुई....फिर भी लिखूंगा...क्योंकि हम सब गलत हैं, सारे कुएं में भांग पड़ी हुई है। हमने किताबी ज्ञान में ठूंस दिया बच्चों को नहीं सिखा पाए लाइफ स्किल। नहीं सिखा पाए डर पर काबू रख शांत मन से काम करना।"

मम्मा डर लग रहा है...एग्जाम के लिए सब याद किया था लेकिन एग्जाम हॉल में जाकर भूल गया...कुछ याद ही नहीं आ रहा था। पांव नम थे...हाथों में पसीना था...आप दो मिनिट उसे दुलारते हैं...बहलाने की नाकाम कोशिश करते हैं फिर पढ़ लो- पढ़ लो- पढ़ लो की रट लगाते हैं। सुबह 8 घंटे स्कूल में पढ़कर आए बच्चे को फिर 4-5 घंटे की कोचिंग भेज देते हैं। जिंदगी की दौड़ का घोड़ा बनाने के लिए, असलियत में हम उन्हें चूहादौड़ का एक चूहा बना रहे हैं। नहीं सिखा पा रहे जीने का तरीका- खुश रहने का मंत्र...साथ ही नहीं सिखा पा रहे लाइफ स्किल। विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और शांतचित्त होकर जीवन जीने की कला नहीं सिखा पा रहे हैं ना और इसके लिए सिर्फ और सिर्फ हम पालक और हमारा समाज जिम्मेदार है।
न्यूजीलैंड की बात करें..वहां पर ....वहां बच्चों को  नर्सरी क्लास स हीे प्राथमिक उपचार से लेकर आग लगने पर कैसे खुद का बचाव करें...फीलिंग सेफ फीलिंग स्पेशल ( चाइल्ड एब्यूसमेंट), पानी में डूब रहे हो तो कैसे खुद को ज्यादा से ज्यादा देर तक जीवित और डूबने से बचाया जा सके.... जैसे विषय हर साल पढ़ाए जाते थे। फायरफाइटिंग से जुड़े कर्मचारी और अधिकारी हर माह स्कूल आते थे। बच्चों को सिखाया जाता था विपरीत परिस्थितियों में डर पर काबू रखते हुए कैसे एक्ट किया जाए। ह्यूमन चेन बनाकर कैसे एक-दूसरे की मदद की जाए.....हेल्पिंग हेंड से लेकर खुद पर काबू रखना ताकि मदद पहुंचने तक आप खुद को बचाए रखें....

हम नहीं सिखा पा रहे यह सब....नहीं दे पा रहे बच्चों को लाइफ स्किल का गिफ्ट...विपरीत परिस्थितियों से बचना....कल की ही घटना देखिए...हमारे बच्चे नहीं जानते थे कि भीषण आग लगने पर वे कैसे अपनी और अपने दोस्तों की जान बचाएं....नहीं सीखा हमारे बच्चों ने थ्री-G का रूल ( गेट डाउन, गेट क्राउल, गेट आऊट ) जो 3 साल की उम्र से न्यूजीलैंड में बच्चों को सिखाया जाता है, आग लगे तो सबसे पहले झुक जाएं...आग हमेशा ऊपर की ओर फैलती है। गेट क्राउल...घुटनों के बल चले...गेट आऊट...वो विंडों या दरवाजा दिमाग में खोजे जिससे बाहर जा सकते हैं, उसी तरफ आगे बढ़े, जैसा कुछ बच्चों ने किया, खिड़की देख कर कूद लगा दी... भले ही वे अभी हास्पिटल में हो  लेकिन जिंदा जलने से बच गए। लेकिन यहां भी वे नहीं समझ पा रहे थे कि वे जो जींस पहने हैं...वह दुनिया के सबसे मजबूत कपड़ों में गिनी जाती है...कुछ जींस को आपस में जोड़कर रस्सी बनाई जा सकती है। नहीं सिखा पाए हम उन्हें कि उनके हाथ में स्कूटर-बाइक की जो चाबी है उसके रिंग की मदद से वे दो जींस को एक रस्सी में बदल सकते हैं...काफी सारी नॉट्स हैं जिन्हें बांधकर पर्वतारोही हिमालय पार कर जाते हैं फिर चोटी से उतरते भी हैं...वही कुछ नाट्स तो हमें स्कूलों में घरों में अपने बच्चों को सिखानी चाहिए। सूरत हादसे में बच्चे घबराकर कूद रहे थे...शायद थोड़े शांत मन से कूदते तो इंज्युरी कम होती। एक-एक कर वे बारी-बारी जंप कर सकते थे। उससे नीचे की भीड़ को भी बच्चों को कैच करने में आसानी होती। मल्टीपल इंज्युरी कम होती, हमारे अपने बच्चों को। आज आपको मेरी बातों से लगेगा...ज्ञान बांट रहा हूं...लेकिन कल के हादसे के वीडियो को बार-बार देखेंगे तो समझ में आएगा एक शांतचित्त व्यक्ति ने बच्चों को बचाने की कोशिश की। वो दो बच्चों को बचा पाया लेकिन घबराई हुई लड़की खुद को संयत ना रख पाई और .... अच्छे से याद  रखना होगा ,कभी आग में फंस जाओ तो सबसे पहले अपने ऊपर के कपड़े उतार कर फेंक देना, मत सोचना कोई क्या कहेगा क्योंकि ऊपर के कपड़ों में आग जल्दी पकड़ती है। जलने के बाद वह जिस्म से चिपक कर भीषण तकलीफ देते हैं...वैसे ही यदि पानी में डूब रही हो तो खुद को संयत करना...सांस रोकना...फिर कमर से नीचे के कपड़े उतार देना क्योंकि ये पानी के साथ मिलकर भारी हो जाते हैं, तुम्हें सिंक (डुबाना) करेंगे। जब जान पर बन आए तो लोग क्या कहेंगे कि चिंता मत करना...तुम क्या कर सकते हो सिर्फ यह सोचना।

जो बच्चे बच ना पाए, उनके माँ बाप का सोच कर दिल बैठा जा रहा है। मेरे एक सीनियर साथी ने बहुत पहले कहा था...बच्चा साइकिल लेकर स्कूल जाने लगा है, जब तक वह घर वापस नहीं लौट आता...मन घबराता है। उस समय मैं उनकी बात समझ नहीं पाया...जब हम पर बच्चों की जिम्मेदारी आई तब समझ आया आप दुनिया फतह करने का माद्दा रखते हो अपने बच्चे की खरोच भी आपको असहनीय तकलीफ देती है...इस लेख का मतलब सिर्फ इतना ही है कि हम सब याद करे हिंदी पाठ्यपुस्तक की एक कहानी...

जिसमें एक पंडित पोथियां लेकर नाव में चढ़ा था...वह नाविक को समझा रहा था 'अक्षर ज्ञान- ब्रह्म ज्ञान' ना होने के कारण वह भवसागर से तर नहीं सकता...उसके बाद जब बीच मझधार में उनकी नाव डूबने लगती है तो पंडित की पोथियां उन्हें बचा नहीं पाती। गरीब नाविक उन्हें डूबने से बचाता है, किनारे लगाता है। हम भी अपने बच्चों को सिर्फ पंडित बनाने में लगे हैं....उन्हें पंडित के साथ नाविक भी बनाइए जो अपनी नाव और खुद  का बचाव स्वयं कर सकें। सरकार से उम्मीद लगाना छोड़िए ... चार जांच बैठाकर, कुछ मुआवजे बांटकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। कुकुरमुत्ते की तरह उग आए कोचिंग संस्थान ना बदलेंगे। इस तरह के हादसे होते रहे हैं...आगे भी हो सकते हैं....बचाव एक ही है हमें अपने बच्चों को जो लाइफ स्किल सिखानी है। आज रात ही बैठिए अपने बच्चों के साथ...उनके कैरियर को गूगल करते हैं ना...लाइफ स्किल को गूगल कीजिए। उनके साथ खुद भी समझिए विपरीत परिस्थितियों में धैर्य के साथ क्या-क्या किया जाए याद रखिए जान है तो जहान है।

( गणपति सिराने ( गणपति विसर्जन)  समय की एक घटना मुझे याद है। हमारी ही कॉलोनी के एक भईया डूब रहे थे...दूसरे ने उन्हें बाल से खींचकर बचा लिया...वे जो दूसरे थे ना उन्हें लाइफ स्किल आती थी....उन्होंने अपना किस्सा बताते हुए कहा था...कि डूबते हुए इंसान को बचाने में बचानेवाला भी डूब जाता है...क्योंकि उसे तैरना आता है बचाना नहीं...मुझे मेरे स्विमिंग टीचर ने सिखाया है कि कोई डूब राह हो तो उसे खुद पर लदने ना दो...उसके बाल पकड़ों और घसीटकर बाहर लाने की कोशिश करो....यही तो छोटी-छोटी लाइफ स्किल हैं)

साभार प्रतिलिपी

Tuesday, 14 May 2019

क्षत्रिय रावणा राजपूत समाज

प्राचीनकाल में राजा के अनेक पुत्र होते थे और राजपूतों में राज्य विभाजन नहीं होता था। अतः राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी होता था और वह राजा कहलाता था। उसके शेष पुत्र राजा के पुत्र होने के कारण राजपुत्र कहलाते थे। कालांतर में राजपुत्र शब्द समूह वाचक या जातिवाचक बन गया और राजपूत कहलाने लगे। पिता की मृत्यु  के बाद बड़ा भाई तो राजा बन गया और शेष छोटे भाई राजा की ही सेवा में विभिन्न पदों पर कार्य करने लगे राजा भी महत्वपूर्ण एवं जिम्मेदारी वाले पदों पर अपने विश्वसनीय एवं वफ़ादार लोगों को ही रखता था और उसके छोटे भाइयों से बढ़कर विश्वसनीय और वफ़दार अन्य कौन हो सकता था ? अतः राज्य के श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण पदों यथा जैसे - राजस्व की वसूली करना, सेना का नेतृत्व करना, राज्य के विद्रोह को दबाना, राजा का विश्वसनीय अंगरक्षक, रनिवास की चैकीदारी करना आदि-आदि कार्य उसी के छोटे भाई करते थे। “इस प्रकार राजा का बड़ा पुत्र तो उत्तराघिकारी होने से राजपूत बन गया और उसी के छोटे भाई रावल कहलाने लगे। यह ’रावल’ एक पदवी होती थी और ’रावल’ का रूप बिगड़कर ’रावला’ हो गया और इसी का अपभ्रंस ’रावणा’ हो गया।

My Village Mataji ka khera

Mataji Ka Khera Village, with population of 1018 isKotri sub district's the 56th most populous village, located in Kotri sub district of Bhilwara district in the state Rajasthan in India. Total geographical area of Mataji Ka Khera village is 6 km2 and it is the 53rd biggest village by area in the sub district. Population density of the village is 175 persons per km2.
Nearest town of the village is Bhilwara and distance from Mataji Ka Khera village to Bhilwara is 45 km. The village has its own post office and the pin code of Mataji Ka Khera village is 311601. Kotri is the sub district head quarter and the distance from the village is 18 km. District head quarter of the village is Bhilwara which is 45 km away. 0.3 square kilometer (5%) of the total village's area is covered by forest.

Demographics

The village is home to 1018 people, among them 535 (53%) are male and 483 (47%) are female. 75% of the whole population are from general caste, 18% are from schedule caste and 7% are schedule tribes. Child (aged under 6 years) population of Mataji Ka Khera village is 16%, among them 56% are boys and 44% are girls. There are 196 households in the village and an average 5 persons live in every family.

Caste wise male female population 2011 - Mataji Ka Khera

TotalGeneralSchedule CasteSchedule TribeChild
Total1,01876218373160
Male535406903990
Female483356933470

Growth of population

Population of the village has decreased by -12.4% in last 10 years. In 2001 census total population here were 1162. Female population growth rate of the village is -16.3% which is -7.8% lower than male population growth rate of -8.5%. General caste population has decreased by -13.8%; Schedule caste population has decreased by -19.4%; Schedule Tribe population has increased by 43.1% and child population has decreased by -20.4% in the village since last census.

Growth of population (percent) 2001 to 2011 - Mataji Ka Khera

TotalGeneralSchedule CasteSchedule TribeChild
Total-12-14-1943-20
Male-9-9-2250-3
Female-16-19-1736-35

Sex Ratio - Females per 1000 Male

As of 2011 census there are 903 females per 1000 male in the village. Sex ratio in general caste is 877, in schedule caste is 1033 and in schedule tribe is 872. There are 778 girls under 6 years of age per 1000 boys of the same age in the village. Overall sex ratio in the village has decreased by 83 females per 1000 male during the years from 2001 to 2011. Child sex ratio here has decreased by 383 girls per 1000 boys during the same time.

Change in sex ratio 2001 to 2011 - Mataji Ka Khera

TotalGeneralSCSTChild
Change-83-11459-90-383
20119038771,033872778
20019869919749621,161

Literacy

Total 348 people in the village are literate, among them 269 are male and 79 are female. Literacy rate (children under 6 are excluded) of Mataji Ka Khera is 41%. 60% of male and 19% of female population are literate here. Overall literacy rate in the village has increased by 20%. Male literacy has gone up by 26% and female literacy rate has gone up by 12%.

Change in literacy rate 2001 to 2011 - Mataji Ka Khera

TotalMaleFemale
Change202612
2011416019
200121347

Workers profile

Mataji Ka Khera has 65% (664) population engaged in either main or marginal works. 64% male and 67% female population are working population. 47% of total male population are main (full time) workers and 17% are marginal (part time) workers. For women 8% of total female population are main and 59% are marginal workers.

Percentage of working population - Mataji Ka Khera

WorkerMain WorkerMarginal WorkerNon Worker
Total65283735
Male64471736
Female6785933

Sunday, 5 May 2019

राजनीतिक पृष्टभूमि


ब्राह्मण बहुल भीलवाड़ा लोकसभा क्षेत्र में अब तक हुए कुल 16 चुनाव में 8 बार ब्राह्मण प्रत्याशी ने बाजी मारी. यहां की जनता ने 9 बार कांग्रेस, 4 बार बीजेपी, 1 बार जनता दल, 1 बार बीएलडी के प्रत्याशी को चुनाव में जिताकर संसद भेजा. यूपीए सरकार के दौरान यहां के सांसद व पूर्व केंद्रीय मंत्री सीपी जोशी के कार्यकाल में भीलवाड़ा में दो इस्पात के कारखाने और रेलवे कोच फैक्ट्रियों का शिलान्यास हुआ. लेकिन केंद्र में सरकार बदलते ये प्रजोक्ट खटाई में पड़ गए. फिलहाल भीलवाड़ा से बीजेपी के सुभाष चंद्र बहेड़िया सांसद हैं. बहेड़िया 1998 में भी यहां के सांसद रह चुके हैं. बहेड़िया को इस कार्यकाल के दौरान भीलवाड़ा में 187 करोड़ की लागत से मेडिकल कॉलेज लाने का श्रेय जाता है जिसमें 50 फीसदी पैसा केंद्र का लगा है.
भीलवाड़ा लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत भीलवाड़ा जिले की 7 विधानसभा-आसींद, भीलवाड़ा, मांडलगढ़, शाहपुरा, जहाजपुर,सहाड़ा, मांडल और बूंदी जिले की एक विधानसभा हिड़ोली आती है. हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों के नतीजों पर नजर डालें तो यहां बीजेपी का पलड़ा भारी है. जिले की 7 में से 5 सीट- पर आसींद, भीलवाड़ा, मांडलगढ़, शाहपुरा, जहाजपुर, बीजेपी का कब्जा है, जबकि मांडल, सहाड़ा और बूंदी जिले की हिड़ोली सीट पर कांग्रेस का कब्जा है.
सामाजिक ताना-बाना
कपड़ा नगरी के नाम से विख्यात भीलवाड़ा लोकसभा क्षेत्र संख्या 23 की बात करें तो यह सामान्य सीट है और राजस्थान के मेवाड़-वागड़ क्षेत्र का हिस्सा है. साल 2011 की जनसंख्या के अनुसार यहां की जनसंख्या 27,53,390 जिसका 80.61 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण और 19.39 प्रतिशत हिस्सा शहरी है. वहीं कुल आबादी का 17.07 फीसदी अनुसूचित जाति और 10.71 फीसदी अनुसूचित जनजाति हैं. अन्य जातियों की बात करें तो भीलवाड़ा में सबसे ज्यादा 3 लाख ब्राह्मण हैं जो कुल आबादी के लगभग 15 फीसदी हैं. जबकि दूसरे नंबर पर 1.5 लाख के करीब गुर्जर मतदाता हैं.
साल 2014 के लोकसभा चुनावों के आंकड़ों के मुताबिक भीलवाड़ा लोकसभा में कुल मतदाताओं की संख्या 17,54,877 है जिसमें 9,04,030 पुरुष और 8,50,847 महिला मतदाता हैं.
2014 का जनादेश
साल 2014 के लोकसभा चुनावों में यहां 63 फीसदी मतदान हुआ था जिसमें बीजेपी को 57.09 फीसदी और कांग्रेस को 34.78 फीसदी वोट मिले थे. बीजेपी के पूर्व सांसद सुभाष बहेड़िया ने कांग्रेस उम्मीदवार अशोक चांदना को 2,46,264 मतों के भारी अंतर से पराजित किया. बीजेपी के सुभाष बहेड़िया को 6,30,317 और कांग्रेस के अशोक चांदना को 3,84,053 वोट मिले थे.
सांसद का रिपोर्ट कार्ड
भीलवाड़ा सांसद सुभाष चंद्र बहेड़िया 2014 से पहले 1996 में भी सांसद रह चुके हैं. वहीं साल 2003-08 तक विधायक रहें. पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट बहेड़िया ने इंटिट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया से उच्च शिक्षा ग्रहण की. उनके एक पुत्र और दो पुत्रियां हैं. 16वीं लोकसभा की बात करें तो संसद में उनकी मौजूदगी 96.57 फीसदी रही. इस दौरान उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों से जुड़े कुल 38 सवाल पूछे और 64 बहस में हिस्सा लिया. सांसद विकास निधि की राशि खर्च करने के मामले में भीलवाड़ा सांसद का रिकॉर्ड कुछ खास नहीं रहा. उन्होंने आवंटित 25 करोड़ रुपये में से 11.35 करोड़ रुपये यानी 45.4 फीसदी ही क्षेत्र के विकास कार्य में खर्च किए.