Wednesday, 24 July 2019

हुंकार री कलंगी


मेवाड़ में भीलवाड़ा से लगभग 64 की.मी. कोशीथल ठिकाणा है। यह ठिकाणा रावत चूंडा जी के वंशज जग्गावत चुण्डावत के वंशधरों है। निम्नलिखित ऐतिहासिक घटना महाराणा राज सिंह जी द्वितीया के शासन काल(1754-1761ई.)में घटित हुई। इस घटना को रानी लक्ष्मी कुमारी चुंडावत ने राजस्थानी भाषा में कुछ यूँ व्यक्त किया है………

मेवाड़ रा सारा सरदारा रे नाम हुकुम लिख्यो ग्यो। “सारा सरदार आपरी पूरी जमीत अर पूरा ससतंरा सूधी उदैपुर हुकूम पोछतां ही हाज़र व्ह जावें। देर नी करें” “हुकुम रे उपरे राणा जी आप दसगतां सूँ  दो ओळां लिखी”‘, “जो हाज़र नी वेला विरी ज़ागीर एकदम ज़ब्त कर ली जावेळा। कायँ तरे री रियायत कोणी होसी। देश री विपद री वेळा में हाज़र नी वेणो हराम ख़ोरी मानी जासी। “

सवारां ने हुकुम रा कागद दे दोड़ाय दीधा।

कोसिथळ रा कामदार रा हाथ में सवार जाय हुकुम पकडायो,रसीद पाई कराई।बाँच्यो,बाँचता ही कामदार रो मूंडो उतरग्यो।कोसीथळ चूण्डावता रीं छोटी-सी जागीर ही। वठा रा ठाकर दो तीन बरस पै’ला एक झगड़ा में काम आयग्या। दो बरस रा टाबर ने छोड़ग्या। ठिकाणा में नैनपण !(बचपन) राणाजी रो यो करड़ो हुकुम!!भगवान चोखी वणाई!!!टाबर ठाकर,री माँ ई बाळक माथै आसा रा दीवा जोवती आपरी जुण काट री।  कामदार जनानी डोढ़ी पै जाय अरज़ कराई,”माँजी साब ने अरज़ करो,जरुरी बात अरज़ करणि हैं।”

डावड़ी जाय कह्यो,”ठिकाणा रा कामदार फोजदार डोढ़ी पै ऊमा है। आप सुं मुंडामुंड बांत करबा ने हाज़र वेह्वा री के है। ”

मांझी री छाती धड़-धड़ करवा लागी,”फेर कोइ नवो दुःख तो नई आयग्यो। ”

डावड़ी ने कह्यो,”बारणा पे पड़दो बांध दे,वाँने मांयनै बुलाय ला।”

बेटा री आंगळी पकड़,पड़दा रे सारे मांयने ऊभी व्हेयग्या। कामदार फोजदार मुजरो कर पड़दा सूँ व्हेग्या। हाथ  लाम्बो कर रणजी रा हुकुम रो कागद पड़दा में मांजी ने झलायो।

“अबै?” “बाँचता ही मांजी रा मुंडा सूं दो अक्खर हीज निकळ्या।” “अबै आप हुकुम दो जो ही करां।ठाकरसा तो पूरा पांच बरस रा ही कोयनी व्हीया,चाकरी में लेर जावां तो किस तरे ले जावा।”मांजी री आंगळी पकड़ने ऊबा बेटा री काळी-काळी भोळी-भोळी आँख्या सूँ जाय टकराई माँ री ममता जागी गी।रूँ रूँ ऊभो व्हेग्यौ,छाती में दूध उतरवा रो सो सरणाटो आयग्यो। लारे रो लारे “जो हाज़र नी व्हेला वीरी जागीर ज़ब्त करली जासी।”हुकुम री औळा बळबळता खीरा री नांई आंख्या आगै चमकगी।

मन में एक साथे क़तरा ही विचार आयग्या। “जागीर जब्त हो जासी?म्हारो बेटो बाप दादा रा राज़ बाहिरो व्हे जावेलो। वीं री पांच में कांई इज़्ज़त रैवेला?वीं रे बाप नीं रिया पणम्हू तो हु। म्हारे जीवतां जींव बेटा रा रो हक छूटे,धिक्कार है म्हारे मिनख जमारा पै। म्हूं असि खोडीली हूँ कांई जो पीढ़ियाँ री भौम ने गमाय दूँ। म्हारा वंश पै दाग नीं लागें?”

वीरीं आंख्या रे आगे एक तसबीर सी आयगी जाणे वीरो जवान बेटो ऊभो है,सगा परसंगी(रिश्तेदार) रोळ में मोसो मार रियो है,”ये लड़ाई में नी पधारया सा जो कोशीथळ ने राणाजी खोस लीधी।हे हे हे!यां चुण्डावता ने आपरी वीरता रो घमंड है।”दूजे ही पल दांता री कट कट्या भींचता बेटा रो निचो माथो,नीची नज़र व्हेती लगी दिखी।

माँजी रा माथा में चक्कर आयग्यो। जवान व्हीया बेटो ई माँ ने जतरो धिक्कारे थोड़ो। वाने याद आयगी आपरे बाप रा मुंडा सूं सुणी जूनी काण्या, लुगाया कसी कसी वीरत सुं झगड़ा कीधा। आँरे ईज खानदान में पत्ताजी चूण्डावत री ठुकराणी अकबर री फोज सूँ लड़ी, गोळियाँ री रीठ बजाय दीधी। पछै म्हूं नीं जावू?

ई विचार सूँ वांरा हालता मन में थिरता आयगी। जीव नेत्र चमकग्या। जीव सोरो व्हेग्यो। घणां ठिमरास (धीरज)सूँ पड़दा री आड में सूँ बोल्या, ‘’धणियाँ रो हुकम माथा पै। करो, जमीत री त्यारी करो। घोड़ा आदमियां ने त्यार होण रो हुकम दो।’’

‘’वो तो ठीक है। पणी धणी बिना फोज कसी।‘’

‘’क्यूँ म्हूं हूँ के धणी। म्हू जावूँला।‘’

“आप।” अचम्भा सूँ कामदार अर फौजदार दोवां रा मुंडा सूँ एक साथ ही निकळ्यो।

“हाँ म्हूँ। अचम्भा री काँई बात है। थांरे इच घराना में कतरी ठुकराणियाँ लड़ाई में जूझी हे के नी?थाँ कस्या जाणो कोयनी?म्हूँ कोई अणूती वात कर री हूँ के,पत्ताजी री माँ अर वांरी ठुकराणी अकबर सूँ लड़ता लड़ता मरयां के नीं?महूँ ही वांरा हीज घरणा में आऊं हूँ। म्हूँ क्यों न जावूँ?”

जमीत सजगी?नागरा पे कूंच रो डंको पड्यो।निसाण री फर्रियाँ खोल दीधी।पाखर गल्यो  घोड़ो आय ऊभो व्हीयो।माथे टोप,जिरह बख्तर रा काळा लोह सूँ ढक्या हाथ बेटा री कंवळी-कंवळी बाहाँ ने पकड़ गोद में उठावा ने आगे व्हीया।टाबर सहमगयो।बोली तो माँ सरीखी अर यो अजब भेख रो आदमी कुण.गालां रे होंठ अड़ाता-अड़ाता माँ री पलकां आली व्हेगी,”बेटा,यो सब थारे वास्तै,थारी इज़्ज़त वास्तै।”एक ठंडी साँस रे साथे वारां होंठ हाल्या।आगे आगे घोड़ा पै भालो भळकावतो फ़ौज रो मांजी अर लारे लारे साड़ी जमीत उदैपुर आय हाज़री में नामो मंडायो,”कोशीथळ रा फलाणा सिंघ चूंडावत मय जमित रे हाज़र।”

हमलो व्हीयो।हड़ोल(हरावल-युद्ध की प्रथम पंक्ति) चुण्डावताँ री। हमलो करे तो पै’लां हड़ोल वाळा ही आगे बढ़े अर सत्रुवाँ से हमलो झेले तो ही हडोल पे ही जोर आवे। सिंधु राग गावण लाग्या। हड़ोल रा अध् बीचे,चूंडावतां रा पाटवी सलूम्बर रावजी ऊभा व्हे बोल्या,”मरदां!दुसमणां पै घोड़ा ऊर दो। मर जाणों पर पग पाछे नीं  देणो। या हड़ोल में रैवा री इज़्ज़त,आपां पिढ्याँ सूँ निभाय रिया हां,आज ई आपणी ज़िम्मेदारी ने पूरी निभावजो,देस सारूं मरणो अमर वेहणो है। हाँ,खेचों लगामाँ।

एक हाथ सू लगाम खेंचि दूजा हाथ में तरवारां तुलगी।

हडोल वालाँ रा घोड़ा उड़्या जारे भेलै मांजी घोड़ा ने उडायो। खचाखच सरु व्ही। तरवारां रा बटका व्हेण लाग्या अर माथाँ रा झटका।

मांजी री तरवार ही पळाका लेय री,एक जणा पे तरवार रो वार कीधो,वी फुर्ती सूँ वार ने ढ़ाल पै झेल पाछो मारयो जो पासळी ने पोवतो लगो बारे निकळ्यो।माँजी री रान छुटगी साथे रै साथै घोड़ा सूँ निचे ढ़लकग्या।

सांझ पड़ी। झगड़ो बंद हुयो। खेत सँभाळवा लाग्या। घायला ने उठाय-उठाय पाटा पीड़ करवा लाग्या। लोह री टोप सुं बारे कैसलटक रीया।पाटो बांधवा  ने हाथ लगायो तो देखे लुगाई। वठै रा वठै ठबक्या रेग्या।”या कुण अर क्यूँ।” राणाजी ने अरज़ व्ही,’घायला में  लुगाई पूरा वीर भेस में मिली।नाम पतो पूछाँ तो बतावै नी।’

राणाजी गिया।लोहा रो टोप निचे गज-गज लम्बा केश लटक रिया,लोयाँ सूँ भरया चिपक रिया।”साँच साँच बतावो नाम ठिकाणो।छिपावो मत दुसमण व्होला तो ही म्हूँ थारो आदर करूँ।म्हारे बेन ज्यूँ हो।”

“कोशीथळ ठाकर री माँ हूँ अन्दाता”माँजी बोल्या। ‘हे!राणाजी अचंभा सूँ कूदया।थां लड़ाई में क्यूँ आया?” “अन्दाता रो हुकुम हो। जो लड़ाई में हाजिर नी वें जीरी जागीर जब्त व्हे जावेला।मारे टाबर छोटो है। हाजर नी व्हेणो मालकाँ  री अर मेवाड़ री हरामखोरी वेह्ती।”करुणा अर गुमान रा आँसू राणाजी रे आँख्या में छलक गिया।”धन्न है थाँ!”राणाजी गदगद व्हेग्या।

“यों मेवाड़ बरसां सूँ  आन राख रियो जो जसी देवियाँ रो प्रताप है। थाँ देवियाँ म्हारो अर मेवाड़  रो माथो ऊंचो कर राख्यो है। जठा तक असि माँवा हे जतरे आपाँ रो देस पराधीन कोनी व्हे।”

ई वीरता रा एवज में,थाँने इज़्ज़त देणो चावूँ,बोलो थाँ ही बतावो,जो थाँरी इच्छा व्हे।मांजी सोच में पड़ग्या,कोई इच्छा व्हे तो माँगे।वाँरी आँख्या आगे बेटा री वे काळी काळीं भोळी भोळी आंख्या फिरगी।माँ री ममता झटको खाय जागगी।

“अनदाता राजी राजी हो अर मर्ज़ी हिज हे तो कोई असि चीज बकसावो जाँसो म्हारो बेटो पांचा में माथो करने बैठे।”

“हुँकार की कलंगी थाँने बगसी जो थाँरो बेटो ही नी पीढ़िया लगाय,कलंगी पै’र ऊंचो माथे कर थाँरी वीरता ने याद रखावैला ।
        #रानी_लक्ष्मीकुमारी_चुण्डावत

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